Come On Digital के पीछे की कहानी

इस  Blog को  Start करने से पहले मैंने ये कभी नहीं सोचा था की यह यात्रा इतनी लम्बी चलेगी ……………

By Harry Shepherd

इस Blog की शुरुआत का बीज मेरे बचपन की कहानी से जुड़ा हुआ है जब India में कम से कम मेरी जानकारी में तो किसी के पास Internet की सुविधा नहीं थी |

 

जब मैं बहुत छोटा था तभी से मैंने हमारे परिवार में सभी को बहुत मेहनत करते हुए देखा था | हालाँकि, हम सब बहुत मेहनती थे इस बात का पता मुझे अभी कुछ सालो पहले ही तब लगा जब मैंने काफी अच्छे पैसे कमाने शुरू कर दिए और पैसो के साथ Life काफी Comfort Zone में बीतने लगी और मैं भी अपने नए दोस्तों की तरह थोडा आरामपसंद हो गया | 

 

बचपन में पापा वैशाली, गाज़ियाबाद में लुहार का काम किया करते थे और मैं उनके बगल में बैठकर उनकी लोहा गर्म करने वाली भट्टी को सुलगाने के लिए पंखा चलाया करता था | पापा को पैसे कमाने के लिए बेहद मेहनत करनी पड़ती थी लेकिन वो कभी नहीं थकते थे |

 

कुछ सालों बाद वैशाली में हमारी और वहाँ  रह रहे 16000 लोगों की झुग्गियो को सरकार ने तुडवा दिया और सभी लोगों को सस्ती किश्तों पर नंदग्राम, गाज़ियाबाद में तीन मंजिला इमारतों में छोटे-छोटे मकान दे दिए गए | 

 

यहाँ आकर हमने पैसे कमाने का एक नया तरीका सीखा | हम कबाड़ी वाले से 4 रुपए किलो के हिसाब से पुराने रद्दी अखबार खरीदते और उनसे लिफाफे बनाकर बेचने लगे | एक किलो अखबार से 80 लिफाफों की लगभग 6 से 8 गड्डियां बन जाती थी और 2 रुपए प्रति गड्डी के रेट से बिक जाती थी | हालाँकि इलाके में और भी लोग लिफाफे बनाते थे और उनके Customer पहले से बने हुए थे इसीलिए Market में अपना माल बेचने के लिए हमने तय किया की हम Same Price पर अपनी गड्डी में 80 की जगह 90 लिफाफे देंगे | 

 

शुरुवात में मम्मी, मैं, मेरी बड़ी और छोटी बहन चार लोगो ने सुबह करीब 9 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक लिफाफे बनाये और हम सब मिलकर केवल 10 गड्डी ही बना पाए यानि केवल 20 रुपए का काम कर पाए जिसमे की 4 से 6 रुपए की हमारी Raw Material की Investment Cost भी शामिल है |  

 

लिफाफों के काम के पहले दिन का Result बड़ा निराश करने वाला था | मैंने और मेरी दोनों बहनों ने हार मान ली लेकिन हमारी मम्मी ने हार नहीं और उन्होंने कहा जब भी हम कोई काम पहली बार करते है तो शुरुआत में हमारी स्पीड बहुत धीरे होती है और कई बार तो हमसे गलती भी हो जाती है लेकिन धीरे-धीरे जब हम उस काम में दक्ष (Expert) हो जाते है तो हमारा Result कई गुना बढ़ जाता है, तो चलो एक बार फिर अखबार लाते है और इस बार पूरी फुर्ती से काम करेंगे और दोगुना काम निकालेंगे |

 

मैं कबाड़ी की दूकान से इस बार पूरे 20 रूपये के 5 किलो अखबार ले आया और हमने पूरे जोश और फुर्ती के साथ लिफाफे बनाये और मम्मी की बात एकदम सच निकली क्योकि पिछली बार से इस बार हमारी speed काफी ज्यादा बढ़ गयी थी | अख़बार काटने से लेकर लेही चिपकाने और गड्डी बांधने में हमारी योग्यता पहले से बढ़ गयी थी और इस बार हमने करीब 27 गड्डियां बनायीं थी | इसके बाद हमने पीछे मुड़कर नहीं देखा | गर्मियों की छुट्टियों में स्कूल बंद थे इसलिए मम्मी, मैं और मेरी दोनों बहने सुबह से लेकर शाम 5 बजे तक लिफाफे बनाते और शाम को मैं और मेरी छोटी बहन उन लिफाफों को बेचने चले जाते | 

 

स्कूल की छुट्टियाँ ख़त्म होने तक तो हम सब बेहद Expert हो गए थे और एक दिन में 100-130 तक गड्डियां बनाने लगे थे जिससे 200 से 260 रुपए तक आमदनी होने लगी थी |

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